शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

रावण

प्रकांड विद्वान
सिद्ध तपस्वी
शिव भक्त
ब्रह्मा वंशज
स्वप्नद्रष्टा
अजर-अमर
होकर भी वह
नायक नहीं
कहलाता है,

एक अहँकार से
हर कोई रावण
हो बन जाता है..

आईये इस दशहरा
अपने अहंकार का
पुतला बनाते है,
अपने ही हाथों
अपने अंदर के
रावण को जलाते है..

अरुण साथी
(विजयादशमी की शुभकामनाएं)

बुधवार, 23 अगस्त 2017

कौरव कौन, पांडव कौन...

कौरव कौन, कौन पांडव (कविता)
*अटल बिहारी वाजपेयी*
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है।
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है।
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है।
प्रस्तुति:-अरुण साथी

रविवार, 28 मई 2017

कमी बाकी रख..

एक मुसलसल सी कमी बाकी रख!
पावों तले थोड़ी सी जमीं बाकी रख!!

ठोकरों से संभलना सीख ले "साथी"!
आंखों में थोड़ी सी नमी बाकी रख!!

महबूब को बेबफा न कहा करो यूँ ही,
मोहब्बत पे थोड़ा सा यकीं बाकी रख!!

@अरुण साथी 21/05/17

शनिवार, 20 मई 2017

मोहब्बत पे यकीं

एक मुसलसल सी कमी बाकी रख!
पावों तले थोड़ी सी जमीं बाकी रख!!

ठोकरों से संभलना सीख ले "साथी"!
आंखों में थोड़ी सी नमी बाकी रख!!

महबूब को बेबफा न कहा करो यूँ ही,
मोहब्बत पे थोड़ा सा यकीं बाकी रख!!

@अरुण साथी 21/05/17

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अफ़ीम

अफ़ीम
**
भूख
गरीबी
बेरोजगारी
अशिक्षा
से बिलखते
माँ भारती के बच्चों को
वे बड़ी आसानी से सुला देते है,
**
ये राजनेता
जागने से पहले ही
बच्चों को फिर से
धर्म की अफ़ीम चटा देते है..
@arunsathi

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

साथी के बकलोल वचन

दहेज प्रथा
बाल विवाह
जात-पात
खतम करे के
नीतीश जी
के जगलो हें चाह,

मने की,
पोलटिक्स छोड़
साहेब पकड़ता अब
सन्यास आश्रम के राह..

#साथी के #बकलोल_वचन

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शगल

जिंदगी का अजीब फ़लसफ़ा है,
हर एक आदमी दूसरे से खफा है!

गैरों के गुनाहों का बही-खाता है सबके पास,

बस अपने गुनाहों का हिसाब रफा-दफा है!

तौहीन करने का शगल ऐसा है उनका,
खुद ही तोहमत लगा लेते कई दफा है!

किसपे करूं यकीन कहो तो "साथी",
करो भरोसा जिसपे मिलती जफ़ा है!!

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

बिना पेंदी का लोटा

जबसे कजरी
बिना पेंदी का लोटा हुआ,
तब से एक एक
वोट का टोटा हुआ..

2

उम्मीद टूटने बालों
का लगा है श्राप,
जमानत जप्ती का
रिकॉर्ड बना रही "आप"..

#साथी के #बकलोल_वचन

परजीवी

परजीवी
****
यार-दोस्त
भाई-बंधु
समान होता है,

और साथ रहकर
आदमी खून चूस
खोखला कर देता है..

साथी के बकलोल वचन
🙈🙊🙉

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

उपदेश

जिनके हाथ खून से सने होते हैं, हाय !! वे भी गांधीवाद का उपदेश देते हैं!!

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

हे राम

हे राम

अपने जीवन में
राम के आदर्शों को
रत्ती भर भी
नहीं उतार रहे हैं,

वैसे लोग भी
चौक-चौराहे पर
जय श्रीराम
चिंघाड़ रहे हैं ...

कैसा कलिकाल
आया अब तो
रावण के वंशज ही
धर्म ध्वजा लेकर
राम को मार रहे हैं...

सोमवार, 27 मार्च 2017

नया खुदा चुन लें..

दुनिया की आबोहवा में जहर बहुत है,
चलो अब मुठ्ठी भर ताजी हवा चुन लें!!

मजहब तो नफ़रत बंटता है आजकल,
चलो अब कोई नया खुदा चुन लें!!

काम जिनका है कातिलों का "साथी",
चलो अब रास्ते उनसे जुदा चुन लें!!

रविवार, 26 मार्च 2017

जख्मों का हिसाब मत रख..

जिंदगी में जख्मों का हिसाब मत रख।
गम के पन्ने हो, वैसी किताब मत रख।।

बच्चों की तरह जीता चल जिंदगी।
चेहरे पे कोई भी नकाब मत रख।।

जिससे है शिकवा तो बता दे उसको।
दिल में छुपा के आफताब मत रख।।

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

यूपी के बौराल होली

यूपी के बौराल होली
(अरुण साथी)
यूपी वाला पे फगुआ के
चढ़लो ऐसन उमंग,
दबा दबा के ईवीएम के
कैलक खूब हुड़दंग
जोगीरा सारा रा रा...

मोदी जी भी पी
लेलका जैसे भंग,
बोल-कुबोल से छोड़ा
देलका यूपी के जंग
जोगीरा सारा रा रा...

सोंच रहल हे बबुआ
बाबू-चाचा से कैलक काहे जंग
चिंता में डूबल डिम्पल भौजी
केकरा डाले रंग
जोगीरा सारा रा रा...

रो रहल हे राहुल बाबा
मम्मी जी के संग
बहिन जी के ब्लड प्रेशर बढ़ गेल
केजरी कहलक "जनता है मन-मतंग"
जोगीरा सारा रा रा...



मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

बंदरी का वेलेंटाइन विश


(अरुण साथी)

आंय जी,
प्रेम विवाह के
दो दशक हुए आपने मुझे
कभी वेलेंटाइन विश नहीं किया..!

मैंने कहा, बंदरी
आजकल के लौंडे
कई को विश करते है।

एक को कॉल तो
दूसरी को मिस करते है।

तीसरी से व्हाट्सअप
तो चौथी से फेसबुक पे
चैटिंग है,
नए दौर के मजनुओं का
दर्जनों से सेटिंग है..

मेरे जैसा प्रेम करके
पत्नीव्रता होना
बकलोली है,

इसी लिए तो आपकी
इतनी बढ़ी हुई बोली है!

प्रेम प्रदर्शन नहीं
आत्माओं का मिलन है।

प्रेम ईश्वर का
प्रसाद है।

प्रेम समर्पण
और त्याग है।

बस क्या
बंदरी ने किस किया,
मुझको भी वेलेंटाइन विश किया..!





मंगलवार, 31 जनवरी 2017

वजूद

वजूद
**
तेज ताप से
खौल उठता है
वजूद...

और उधियाने
लगता है

तभी कोई अपना
पानी का छींटा देकर
संभल लेता है..
उधियाते वजूद को..

(तस्वीर को कैद करते हुए दो शब्द गढ़ दिए..)
@अरुण साथी

रविवार, 29 जनवरी 2017

मौत से पहले..

मौत से पहले...

बहुत भचर-भचर करते हो
मार दिए जाओगे
एक दिन
उन्हीं लोगों की तरह..

लगी होगी एक-आध गोली
पीठ में, सीने में
या कनपट्टी के आसपास कहीं..

बीच सड़क पे
बिखर जायेगा तुम्हारी रगो
का खौलता हुआ खून
और लहू का लाल रंग
काली तारकोल से मिलकर
गडमड रंग का हो जायेगा...

हाँ, कुछ लोग आएंगे
सहानुभूति जताएंगे
पर कुछ लोग वहीं
लाश के सिरहाने ही
गाली भी देंगे
कुछ बुरा,
कुछ भला कहेंगे..

क्यों और किसके लिए
यह सब करते हो...

उपरोक्त आत्मीय
वचनों के बीच के
अंतर्मन में
नाद गूँज उठा

"मौत से पहले कौन मरा है?"
"मौत आने पर कौन बचा है..?"




शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

साथी के बकलोल वचन

"अहिंसा परमो धर्मः"
कहने वाले गाँधी की
तस्वीर खादी से मिटा दी....

हंगामा क्यों है बरपा
जो उन्होंने अपनी
फितरत बता दी.….

#साथी के #बकलोल_वचन

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

महुआ महके..

महुआ महके तोर अंगना में,
सूरजमुखी खिल जाये।
बेला, जूही, हरसिंगार सन,
जीवन खुशबु  से भर जाये।।

सरसों फूलो, मांजर महके,
धान, गेहुम लहराये।
केतारी सन रसगर हो जीवन,
मटर, मकई नियर गदराये।।

कोयल कूके, बुलबुल गाये,
तोता, मैना शोर मचाये।
आये गोरैया, पानी पिए,
अंगना में, धप्चुहिया मुस्काये।।

चुमनुमिया चिरैया शोर मचाये,
कागा आके भोर जगाये।
खिले गुलाब, गेंदा गोदी में,
कहे "साथी" बथान में गोरु-गाय डोंराय।।

*नव बर्ष की मंगलकामनाएं..*
अरुण साथी, पत्रकार, बरबीघा, (बिहार)

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

आम आदमी

भागमभाग
उठापटक
कभी उधर
कभी इधर
सपने-हकीकत
घर-परिवार
दोस्ती-यारी
देश-समाज
दाल-रोटी
की जद है जिंदगी..
**
घिसे चप्पल
सिले जूते
चिप्पी पैंट
फटे जेब
फटी चादर
और लंबे पैर
की हद है जिंदगी..
**
एक चुटकी ईमानदारी
मुठ्ठी भर बेईमानी
मन भर आत्मा
छटाँक भर परमात्मा
बड़े बड़े बोल
कर्म, कुकर्म
बस यही सब
कशमकश है ज़िन्दगी...
***
सुबह सूरज उगे
कि फूल खिले
पंछी के गीत हो
कि शाम ढले
नया साल आये
कि पुराना साल जाये
आम आदमी के लिए
तो बस
जद्दोजहद है जिंदगी..
(27-12-16)

बुधवार, 30 नवंबर 2016

विरहन..

जब भी वह मिलती है
हौले से मुस्कुरा,
आहिस्ते से मचलती है!

वैसे ही जैसे,
सूरज की लाली से
सूर्यमुखी खिलती है!


वैसे ही जैसे,
भौरे की गुनगुन से
कली की पंखुड़ी खुलती है!

वैसे ही जैसे,
चाँद की चांदनी से
चकोर मचलती है!

वैसे ही जैसे,
मोर नृत्य से
मोरनी पिघलती है!

वैसे ही जैसे,
प्रेमपुलक
गजगामिनी निकलती है!

वैसे ही जैसे,
प्यासी धरा से
मेघ मिलती है!

वैसे ही जैसे
धूप के ताप से
बर्फ पिघलती है!

और 
वैसे ही जैसे,
सूर्य मिलन को
फीनिक्स पंक्षी 
की अभीप्सा जलती है..

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

झूठ की खेती

झूठ की खेती
(अरुण साथी)

वह बंजर जमीन हो
या कि हो
मरूभूमि
या हो
पठार-पर्वत

कुछ लोग
बड़े कुशल उद्यमी
होते है

और वे बंजर जमीन पे भी
झूठ की फसल बोते है

लच्छेदार बातों से
उसे सींचते
कोड़ते और निकोते है

सच कहता हूँ
कुछ लोग
झूठ की खेती करने में
बड़े मास्टर होते है..

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

परिवार

परिवार
**
माँ-बाबु जी का
गलतियों पे डाँटना,
उदासी का कारण पूछ
दुःख बाँटना है।
अच्छा लगता है..

2
दोपहर को खाने का
मिसकॉल आना,
देर रात  घर पहुँचने पे
बीबी का रूठ जाना।
अच्छा लगता है..

3
बिना वजह आप किसी से
भी क्यों उलझते है,
दुनिया की छोड़ अपनी
फ़िक्र करो; भाई का समझाना।
अच्छा लगता है...

4
बेटा का खिलौने
की जिद्द नहीं पकड़ना
टूटे जूते को देख टोकने पर,
अभी चलेगा पापा कहना।
अच्छा लगता है..

5
मुंहझौंसी, जरलाही कहके
बीबी को चिढाना,
मायके की शिकायत पे
उसका मुंह फूलना।
अच्छा लगता है..

6
बेटी की सहनशक्ति
गाहे-बेगाहे सामने आना,
अभावों को छुपा कर
उसका मुस्कुराना।।
अच्छा लगता है...

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

दासी लोकतंत्र

दासी लोकतंत्र
**
साथी उवाच

"क्यों
जनतंत्र में
मालिक जनता
भूखी और प्यासी है?

राजा के घर क्रंदन
क्यों है?

क्यों मुख पे
छाई उदासी है?"

**
बकलोल उवाच

"क्योंकि
लोकतंत्र तो
वंशवादी,
जातिवादी,
धर्मवादी,
नेताओं के
चरणों की दासी है।।।
(शपथ ग्रहण के बाद उत्तरप्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह के पैरों में लटके मंत्री गायत्री प्रजापति प्रसंग पे)

शनिवार, 17 सितंबर 2016

भूख और माँ

भूख और माँ

(सोशल मीडिया पे वायरल इस तस्वीर को देखकर साथी के शब्द.. निःशब्द..)
**
जिंदगी है
मौत है
और है
मौत से भी
भयावह
क्रूर
बर्बर
भूख..

इसीलिए तो
भूख और माँ
की लड़ाई में
भूख जीत जाता है
माँ हार जाती है..
अक्सर..